प्रोफेसर, छात्र और डायरी...

प्रोफेसर शिरीन की कहानी, जिसने अपनी मृत बहन की डायरी का पाठ कर छात्रों को जीवन के लिए प्रेरित किया।

उस दिन प्रोफेसर शिरीन कुछ अलग-सी दिख रही थीं। जब वह क्लास में आई, तो सन्नाटा छा गया। जो छात्र कभी चुप नहीं बैठते थे, वे भी प्रोफेसर को देख खामोश हो गए। प्रोफेसर बोलीं, आज मैं आपको कुछ पढ़कर सुनाऊंगी। उन्होंने पढ़ना शुरू किया

प्रोफेसर, छात्र और डायरी...

मैं बोलती कम, सुनती ज्यादा हूं, मैं अपने दोस्तों के बुलाने पर उनको कभी नहीं नकारती, अपने घर पर हफ्ते में कम से कम तीन दिन दोस्तों को पार्टी पर बुलाती हूं, मैं कागज के उन टुकड़ों पर कम ध्यान देती हूं, जो मेरे कमरे में बिस्तर के नीचे तुमने फेंक दिए थे, और तुम पर गुस्साने के बजाय तुमसे खूब सारी बातें करती हूं। मै दादाजी के साथ रोज शाम को सैर पर जाती और उनके अनुभवों से ढेर सारा सीखती हूं। मैं पापा के साथ स्कूटर पर बैठती हूं और यह नहीं सोचती कि मेरे बाल उड़ते हैं, या खराब होते हैं। मैं बस उस हवा को अपने बालों से तैरते हुए निकलते देखती और उस अनोखी गुदगुदी का आनंद लेती हूं। मैं कभी घास में बैठती हूं, कभी जमीन पर लोटती हूं। मैं रोज की तरह बिना नींद के ठीक दस बजे सोने नहीं जाती। जब छोटू और स्वीटी खेलकर घर आते हैं, तो मैं कभी जके गंदे कपड़ों पर नहीं गुस्साती, बल्कि उनको जोर से गले लगाकर बोलती हूं, चलो, फिर से खेलें। मै रोज अपनी डायरी लिखने में समय नहीं गंवाती, बल्कि वह समय कुछ अनमोल यादें बुनने में बिताती हूं। काश कि मैं यह सब कर पाती, यह पढ़ते-पढ़ते प्रोफेसर शिरीन की आंखों में आंसू थे। वह बोलीं, यह मेरी बहन की डायरी के कुछ पन्ने हैं, जिनकी पिछले साल कैंसर से मृत्यु हो गई। ऐसा नहीं था कि वह मेरे साथ हंसती-बोलती नहीं थी। पर वह हमेशा कहा करती थी कि एक दिन हम वह सब करेंगे। हम सब यह सोचकर अपने आज से कई समझौते करते हैं कि कल हम सब कर लेंगे। लेकिन कल पता चलता है कि वह आज तो गुजर गया। अब यह आपके हाथ में है कि आप अपने आज से कितने समझौते करना चाहते हैं।

Moral of the story - जिंदगी को इस तरह जियो, जैसे - आज ही आखिरी दिन है।


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